वसीयत की वैधता और सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण: स्वर्णलता बनाम कलावती मामला

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सुप्रीम कोर्ट ने स्वर्णलता बनाम कलावती मामले में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (Indian Succession Act, 1925) के तहत वसीयत की वैधता (Validity) से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से विचार किया। इस मामले में मुख्य प्रश्न यह था कि क्या वसीयत संदेहजनक परिस्थितियों से ग्रस्त थी और क्या इसे रद्द (Invalidate) किया जाना चाहिए।

वसीयत की वैधता के कानूनी सिद्धांत

इस निर्णय में वसीयत से संबंधित कानूनी सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया है, जिनमें यह निर्धारित किया गया है कि वसीयत को मान्यता देने के लिए किन आवश्यक शर्तों को पूरा करना जरूरी है और किन परिस्थितियों में इसे चुनौती दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई संदेहजनक परिस्थिति पाई जाती है, तो वसीयत को वैध साबित करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की होगी जो इसे प्रमाणित (Prove) कर रहा है।

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की भूमिका

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 वसीयत बनाने और उसके प्रमाणन (Probate) की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। इसकी धारा 63 (Section 63) वसीयत के लिए आवश्यक औपचारिकताओं को निर्धारित करती है, जिनमें शामिल हैं:

  • वसीयत का लिखित होना
  • वसीयत करने वाले व्यक्ति (Testator) का हस्ताक्षर
  • कम से कम दो गवाहों (Witnesses) का सत्यापन (Attestation)

वसीयत को मान्य साबित करने में साक्ष्य का महत्व

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (Indian Evidence Act, 1872) की धारा 68 (Section 68) के तहत, वसीयत को मान्य साबित करने के लिए कम से कम एक गवाह का बयान आवश्यक है। साथ ही, धारा 270 से 289 (Sections 270-289) में प्रोबेट प्रक्रिया (Probate Process) का उल्लेख किया गया है, जबकि धारा 384 (Section 384) के तहत प्रोबेट को चुनौती देने की अनुमति दी गई है।

संदेहजनक परिस्थितियों का प्रभाव

यदि वसीयत के निर्माण में कोई संदेहजनक परिस्थिति पाई जाती है, तो उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने एच. वेंकटचलैया अय्यंगर बनाम बी. एन. थिम्माज्जम्मा (1959) मामले में स्पष्ट किया कि संदेह की स्थिति में इसे दूर करने की जिम्मेदारी वसीयत को प्रमाणित करने वाले व्यक्ति की होगी। शशि कुमार बनर्जी बनाम सुभाष कुमार बनर्जी (1964) में भी कहा गया कि वसीयत का पंजीकरण (Registration) मात्र यह साबित नहीं करता कि वह स्वतंत्र रूप से बनाई गई थी।

मानसिक स्थिति का महत्व

वसीयत करने वाले की मानसिक स्थिति (Mental Condition) कानून में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि वसीयत करते समय व्यक्ति मानसिक रूप से सक्षम (Capable) नहीं था, तो वसीयत अमान्य हो सकती है। गौरव कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मानसिक स्थिति को साबित करने के लिए मेडिकल प्रमाण और गवाहों के बयान अत्यंत आवश्यक होते हैं।

निष्पादन और साक्ष्य की भूमिका

वसीयत को वैध बनाने के लिए उसका उचित निष्पादन (Execution) और साक्ष्य (Attestation) आवश्यक है। जसवंत कौर बनाम अमृत कौर (1977) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि वसीयत के किसी गवाह को अदालत में नहीं बुलाया जाता, तो यह वसीयत को अस्वीकृत (Reject) करने का आधार हो सकता है।

प्रोबेट का निरस्तीकरण

यदि प्रोबेट प्रक्रिया में कोई गंभीर त्रुटि (Error) पाई जाती है, तो इसे चुनौती दी जा सकती है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 384 (Section 384) के तहत न्यायिक प्रक्रिया का पालन न होने पर प्रोबेट को रद्द किया जा सकता है। कविता कंवर बनाम पामेला मेहता (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलीय न्यायालयों (Appellate Courts) को प्रोबेट मामलों की जांच सावधानीपूर्वक करनी चाहिए।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय दर्शाता है कि वसीयत को वैध बनाने के लिए सभी कानूनी प्रक्रियाओं (Legal Procedures) का कड़ाई से पालन आवश्यक है। यह फैसला न्यायपालिका की सतर्क दृष्टि (Cautious Approach) को प्रतिबिंबित करता है, जो सुनिश्चित करती है कि वसीयत बिना किसी बाहरी दबाव (Undue Influence) और कानून के पूर्ण अनुपालन (Strict Compliance) में बनाई जाए।

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