जमानत सुनवाई टालना सही नहीं: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

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कई बार आरोपी को जमानत मिलने में देरी इसलिए होती है क्योंकि वह अदालत द्वारा मांगी गई राशि जमा नहीं कर पाता। सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी 2026 को स्पष्ट किया कि जमानत सुनवाई टालना सही नहीं है, केवल राशि जमा न करने के आधार पर। यह फैसला जमानत सुनवाई टालना की प्रथा पर रोक लगाता है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है।

जमानत सुनवाई टालना हिंदी में समझें: यह निर्देश नए आपराधिक कानूनों BNS, BNSS, BSA के तहत आरोपी के अधिकार मजबूत करता है। www.expertvakil.com पर जमानत कानूनी सलाह लें।

मामले की पृष्ठभूमि

एम/एस प्रगत अक्षय ऊर्जा लिमिटेड को 4.10 करोड़ रुपये की सरकारी सब्सिडी मिली थी। कंपनी निदेशक पर धारा 409 आईपीसी (अब BNS के समकक्ष) के तहत गबन का आरोप लगा। उसे 12 दिसंबर 2019 को गिरफ्तार किया गया।

कंपनी ने 2.17 करोड़ जमा किए, लेकिन शेष राशि पर अंडरटेकिंग दी। दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरिम जमानत दी, लेकिन नियमित जमानत लंबित रखी। बाद में शेष राशि न जमा होने पर अंतरिम जमानत रद्द कर दी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

Supreme Court judges delivering verdict on bail hearing delays in 2026 case.

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा, “जमानत याचिका उसके गुण-दोष पर तय हो, न कि अग्रिम जमा पर।” जमानत सुनवाई टालना सही नहीं क्योंकि यह न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग करता है।

कोर्ट ने निर्देश दिया: हाईकोर्ट तीन सप्ताह में याचिका का फैसला करे। यह जमानत सुनवाई टालना 2026 अपडेट है, जो आरोपी को त्वरित सुनवाई का अधिकार देता है।

  • जमानत का निर्णय मेरिट पर हो।
  • राशि जमा पूर्व शर्त न बने।
  • कंपनी निदेशक पर स्वतः दोष धारणा नहीं।
  • ​कानूनी आधार और तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

“कंपनी के निदेशक के खिलाफ IPC की धारा 409 के तहत कोई स्वतः दोषसिद्धि की धारणा नहीं होती। निदेशक की आपराधिक जिम्मेदारी ट्रायल में सिद्ध की जानी होती है। ऐसे में, जब कथित रूप से गबन की गई सब्सिडी की 50 प्रतिशत से अधिक राशि पहले ही जमा हो चुकी है तो केवल शेष राशि जमा न होने के आधार पर जमानत पर विचार न करना उचित नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट ने गजानन दत्तात्रय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला दिया। वहां कहा गया कि जमानत को वित्तीय शर्तों से न जोड़ा जाए। राज्य ने कुंदन सिंह मामले का जिक्र किया, लेकिन कोर्ट ने कहा दोनों अलग परिस्थितियों के हैं।

जमानत सुनवाई टालना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। कोर्ट ने चेतावनी दी: ऐसी शर्तें शिकायतकर्ता को ब्लैकमेल का हथियार देती हैं। ट्रायल में दोष सिद्ध होना जरूरी।

BSA के तहत सबूत प्राथमिक होने चाहिए, न कि अनुमान पर जमानत टाली जाए।

BNS, BNSS, BSA में जमानत प्रावधान

BNS में धारा 409 आईपीसी समकक्ष अपराध है, जहां विश्वासघात पर सजा। BNSS धारा 479: अंडरट्रायल को अधिकतम सजा के आधे समय पर जमानत। पहली बार अपराधी को बॉन्ड पर रिहा।

जमानत कानूनी सलाह हिंदी में: BNSS धारा 478-496 बेल और बॉन्ड पर। डिफॉल्ट बेल धारा 187(3): चार्जशीट न दाखिल होने पर। 2026 अपडेट: जेल अधीक्षक को आवेदन देना अनिवार्य।

अन्य महत्वपूर्ण केस लॉ

  • गजानन गोरे केस: जमानत वित्तीय शर्त पर न रोकी जाए।
  • कुंदन सिंह: स्व सहमति शर्त बाध्यकारी, लेकिन सीमित।
  • 2025 राउंडअप: हाईकोर्ट बेल 2 माह में निपटाए।

जमानत सुनवाई टालना 2026 अपडेट इनसे मजबूत। www.expertvakil.com पर पढ़ें। BSA में सह-आरोपी गवाही कोरेबोरेशन जरूरी।

आपके अधिकार कैसे बचाएं

जमानत सुनवाई टालना रोकने के उपाय:

  1. याचिका में मेरिट पर जोर दें, अंडरटेकिंग अलग रखें।
  2. BNSS धारा 479 का हवाला दें यदि हिरासत लंबी।
  3. सुप्रीम कोर्ट फैसले संलग्न करें।
  4. वकील से त्वरित सुनवाई मांगें।

www.expertvakil.com/contact पर जमानत कानूनी सलाह लें। व्हाट्सएप +91-8980028995।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश जमानत सुनवाई टालना सही नहीं मानता है, जो BNS, BNSS के तहत आपके अधिकार मजबूत करता है। देरी से बचाव कर न्याय जल्दी पाएं। सोचें, अपने अधिकार जानें, इस पोस्ट को शेयर करें और कमेंट में अपनी राय दें। अधिक जानकारी के लिए www.expertvakil.com, ईमेल Info@expertvakil.com, व्हाट्सएप +91-8980028995।

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