पीरियड लीव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सुनवाई से इनकार, महिलाओं की नौकरी पर खतरा!
सुप्रीम कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए मासिक धर्म अवकाश (पीरियड लीव) को अनिवार्य बनाने की जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने चिंता जताई कि ऐसा कानून महिलाओं को नौकरी देने से नियोक्ताओं को हिचकिचाहट हो सकती है, जिससे उनका करियर प्रभावित होगा।
यह फैसला 12-13 मार्च 2026 को आया, जब याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने देशव्यापी नीति की मांग की।
याचिका का पूरा विवरण
याचिका में मांग की गई थी कि सभी कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान पेड लीव दी जाए, जैसा गर्भावस्था में होता है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि कुछ राज्य और कंपनियां इसे देती हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर निर्देश जरूरी है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि कोई महिला खुद आगे क्यों नहीं आई, और निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं की मजबूरी को समझा। CJI ने कहा, “किसी कंपनी को जबरन छुट्टी देनी पड़ी तो उनका मनोबल टूटेगा।”
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा, “पीरियड लीव अनिवार्य करने से कोई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी नहीं देगा, उनका करियर खत्म हो जाएगा।” बेंच ने जोर दिया कि ऐसी नीतियां नीति निर्माताओं पर छोड़ें, कोर्ट हस्तक्षेप न करे।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को हितधारकों से परामर्श कर नीति बनाने की सलाह दी, लेकिन कोई आदेश नहीं दिया। इससे पहले 2023-24 में इसी याचिकाकर्ता की याचिकाओं पर भी समान टिप्पणियां हुई थीं।

भारत में पीरियड लीव की वर्तमान स्थिति
भारत में कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है, लेकिन कई राज्य नीतियां चला रहे हैं। बिहार (1992 से सरकारी कर्मचारियों को), कर्नाटक (2025 से सभी क्षेत्रों में 12 दिन सालाना), ओडिशा (2024 से 12 दिन) और केरल (शिक्षा संस्थानों में) पीरियड लीव देते हैं।
कई निजी कंपनियां जैसे Zomato, Byju’s भी स्वेच्छा से देते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राष्ट्रीय नीति की उम्मीद कम हो गई।
| राज्य/क्षेत्र | लीव की अवधि | लागू क्षेत्र |
|---|---|---|
| बिहार | 2 दिन/माह | सरकारी कर्मचारी |
| कर्नाटक | 1 दिन/माह (12/वर्ष) | सरकारी+निजी |
| ओडिशा | 1 दिन/माह | सरकारी+निजी |
| केरल | सीमित | शिक्षा संस्थान |
दुनिया भर में पीरियड लीव नीतियां
जापान, स्पेन, दक्षिण कोरिया जैसे देशों में पीरियड लीव कानूनी रूप से मान्य है। जापान में 3-5 दिन पेड लीव मिलती है, लेकिन उपयोग कम होता है। इंडोनेशिया और जाम्बिया भी इसे देते हैं।
भारत में राज्य स्तर पर प्रगति हो रही है, लेकिन कोर्ट ने चेतावनी दी कि जबरन कानून उल्टा असर डाल सकता है।
महिलाओं के अधिकारों पर प्रभाव
यह फैसला महिलाओं के स्वास्थ्य बनाम रोजगार के बीच संतुलन दिखाता है। कोर्ट ने माना कि मासिक धर्म की तकलीफें वास्तविक हैं, लेकिन कानूनी अनिवार्यता से भेदभाव बढ़ सकता है।
हालांकि, स्वैच्छिक नीतियां बढ़ रही हैं। सरकार को अब हितधारकों से चर्चा कर रास्ता निकालना होगा। यह फैसला न्यायिक संयम का उदाहरण है।
निष्कर्ष: आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट ने नीति निर्माण को विधायिका पर छोड़ दिया, जो व्यावहारिक है। महिलाओं के लिए जागरूकता और स्वैच्छिक नीतियां ही समाधान हैं। भविष्य में केंद्र नीति ला सकता है।



















