धारा 27 साक्ष्य अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: सबूतों की कड़ी पूरी न हो तो सिर्फ़ खुलासे का बयान और बरामदगी सज़ा के लिए पर्याप्त नहीं, हत्या के आरोपियों को बरी किया गया
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक परिस्थितिजन्य सबूतों की पूरी कड़ी मज़बूती से साबित न हो जाए, तब तक केवल धारा 27 साक्ष्य अधिनियम के तहत दिए गए खुलासे (disclosure) के बयान और उससे हुई बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
- यह मामला एक कथित हत्या से संबंधित था, जिसमें अभियोजन पक्ष का पूरा केस परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित था।
- अभियोजन ने मुख्य रूप से साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत दर्ज खुलासे के बयान, उन बयानों के आधार पर मृत‑देह की बरामदगी, और कथित मकसद, आखिरी बार साथ देखे जाने (last seen), तथा साजिश जैसे पहलुओं पर भरोसा किया।
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले
- ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि परिस्थितियों की चेन अधूरी है, बरामदगी और खुलासे के बयान अपने‑आप में सज़ा देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, और मुख्य गवाह (विशेषकर एकमात्र “लास्ट सीन” गवाह PW‑5) भरोसेमंद नहीं है।
- ट्रायल कोर्ट ने मेडिकल सबूत और अभियोजन द्वारा पेश समय‑सीमा के बीच गंभीर विरोधाभासों को भी नोट किया।
- कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस बरी के आदेश को पलटते हुए धारा 27 के तहत खुलासों और शव की बरामदगी को ऐसी निर्णायक कड़ियाँ माना जो आरोपियों को अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त हैं, भले ही पूरी परिस्थितिजन्य चेन स्थापित न हो पाई हो।
सुप्रीम कोर्ट की कानूनी टिप्पणी
- जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने माना कि सिर्फ़ तथाकथित कबूलनामे जैसे खुलासे के बयान और उस पर आधारित लाश की बरामदगी (जो स्वयं भी ठीक से साबित नहीं थी) के आधार पर सज़ा नहीं दी जा सकती।
- कोर्ट ने कहा कि इस मामले में एकमात्र कथित चश्मदीद/“लास्ट सीन” गवाह PW‑5 विश्वसनीय नहीं पाया गया और अभियोजन जिन अन्य परिस्थितियों पर निर्भर था, वे भी इस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए पर्याप्त नहीं थीं कि आरोपियों ने ही अपराध किया है।
- निर्णय में दोहराया गया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य वाले मामलों में अभियोजन को ऐसी संपूर्ण चेन स्थापित करनी होती है, जो किसी भी मासूम व्याख्या की संभावना को समाप्त कर दे और केवल आरोपी की अपराध‑सिद्धि की ओर ही इशारा करे।
अपीलीय अदालत की सीमाएँ
- सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धांत एक बार फिर रेखांकित किया कि यदि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से दो संभावित निष्कर्ष निकलते हों, तो अपीलीय अदालत को ट्रायल कोर्ट के बरी के निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
- यदि ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण एक संभाव्य और तर्कसंगत दृष्टिकोण है, तो केवल इस आधार पर उसकी बरी को नहीं पलटा जा सकता कि एक दूसरा दृष्टिकोण भी संभव है।
अंतिम परिणाम और महत्व
- सुप्रीम कोर्ट ने अभियुक्तों की अपील स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया बरी का आदेश बहाल कर दिया।
- इस फैसले ने यह सिद्धांत मज़बूती से दोहराया कि धारा 27 के तहत किए गए खुलासे और रिकवरी, बिना मज़बूत और पूर्ण परिस्थितिजन्य चेन के, अकेले दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते।
- मामला TULASAREDDI @ MUDAKAPPA & ANR. बनाम THE STATE OF KARNATAKA & ORS. शीर्षक से दर्ज था, जिसमें जुड़े हुए अन्य मामले भी शामिल थे।


