स्टाफ़ ने जमानत रिकॉर्ड को ‘रिजेक्टेड’ की जगह ‘अलाउड’ लिखा

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भारतीय न्याय व्यवस्था में कोर्ट के आदेशों की finality और certainty कितनी महत्वपूर्ण है, यह हाल ही में रामबली साहनी बनाम बिहार राज्य (Rambali Sahni versus State of Bihar) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया। इस फैसले ने निचली अदालतों को सख्त संदेश दिया है कि एक बार जज द्वारा आदेश साइन हो जाए, तो उसे बाद में स्टाफ की ‘क्लेरिकल मिस्टेक’ बताकर वापस नहीं लिया जा सकता। आइए इस केस की पूरी कहानी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को विस्तार से समझते हैं।

केस की पृष्ठभूमि: पटना हाई कोर्ट की गलती

  • पटना हाई कोर्ट ने आरोपी रामबली साहनी की बेल अर्जी पर सुनवाई की।
  • कोर्ट ने फैसला सुनाया और आदेश में लिखा “Allowed” (बेल मंजूर), जो जज ने साइन कर दिया।
  • लेकिन बाद में कोर्ट ने इसे रि-कॉल (recall) कर दिया, दावा करते हुए कि स्टेनोग्राफर की गलती से “Rejected” की जगह “Allowed” लिख दिया गया था।
  • आरोपी ने इस रि-कॉल ऑर्डर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

यह मामला इसलिए चर्चा में आया क्योंकि निचली अदालतों में ऐसी ‘क्लेरिकल एरर’ का बहाना अक्सर इस्तेमाल होता है, जो न्याय की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: क्या सुधारा जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के रि-कॉल ऑर्डर को रद्द कर दिया और स्पष्ट निर्देश दिए:

मुख्य तर्क:

  1. साइन ऑर्डर की पवित्रता: एक बार जज द्वारा आदेश साइन हो जाए, तो वह final हो जाता है। इसे बाद में रद्द करना कानूनन अमान्य है।
  2. क्लेरिकल एरर की सीमा: केवल छोटी-मोटी गलतियां जैसे टाइपिंग एरर (नाम गलत लिखना) या अरिथमेटिक एरर (गणना में त्रुटि) को सुधार (correction) किया जा सकता है। लेकिन “Allowed” को “Rejected” बदलना कोई छोटी गलती नहीं—यह पूरा फैसला उलटना है।
  3. न्यायिक अनिश्चितता का अंत: कोर्ट ने कहा कि आदेशों में finality और certainty जरूरी है, वरना पक्षकारों का भरोसा न्याय व्यवस्था पर डगमगा जाएगा।

जस्टिसों ने उदाहरण दिया: मान लीजिए एक चेक साइन हो गया, तो बैंक उसे ‘गलती से’ रद्द नहीं कर सकता। वैसे ही कोर्ट ऑर्डर में भी लॉ ऑफ द केस लागू होता है।

इस फैसले का प्रभाव: व्यक्ति और व्यवसायों के लिए क्या मतलब?

  • व्यक्तिगत मामलों में: बेल, जमानत या अंतरिम राहत जैसे ऑर्डर अब सुरक्षित। अगर साइन हो गया, तो रद्द करने की कोशिश नहीं हो सकती।
  • व्यवसायों के लिए: कॉन्ट्रैक्ट विवादों या सिविल सूट्स में स्टे ऑर्डर की सुरक्षा बढ़ेगी। Free Legal Advice: अगर आपको कोई साइन ऑर्डर रद्द करने की कोशिश हो रही है, तो तुरंत हाई कोर्ट जाएं।
  • निचली अदालतों के लिए संदेश: स्टाफ की गलतियों का बहाना अब नहीं चलेगा। जजों को फैसले दोबारा पढ़ने की आदत डालनी होगी।

यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सभी अदालतों के लिए बाध्यकारी है।

स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का मूल फैसला (Rambali Sahni vs State of Bihar)। अधिक जानकारी के लिए आधिकारिक वेबसाइट देखें।

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